ना जाने ये क्या हैं,
कौन सही है कौन गलत हैं,
क्या पता मैं कितनी सही हूं,
ये दुनिया कितनी भ्रष्ट है,
सबको मालूम है कि वो खुद भी गलत है,
फिर भी एक दूजे पर लगाते आरोप हैं,
कोई बदलना चाहता ही नहीं,
बस चाहते हैं तो सबको बदलना,
जब तक हम खुद नहीं बदलेंगें,
तब तक दुसरे से कैसे उम्मीद कर सकते
हैं,
एक- दुजे से ही तो ये संसार बना हैं,
रोज सुनने में आता है,
कल यहां कुछ गलत हुआ था, आज वहां,
गलत काम करने वाला बाहर से तो आता नहीं
है,
आखिर है तो इसी दुनिया का,
हमारे ही बीच जन्म लेता है, बडा होता
है,
उसकी भी मां – बहनें हैं,
फिर वो क्यों नहीं हर लडकी को सम्मान
देता,
क्यों नहीं किसी की मां, बहन को सम्मान
देता,
अगर हर आदमी ऐसा सोचता,
तो फिर किसी पिता, पति, भाई को,
चिंता करने की जरूरत ही नहीं पडती।