Thursday, 4 February 2016

"सिर्फ वो"

माँ ने था पाला, बड़ा किया
गलियों में थी घूमी वो, आँगन में खेली
अम्मा की लाड़ली वो, बाबा की थी दुलारी
पल पल याद आती वो मीठी गिरि

चली थी स्कूल वो उठाये थैला
गुरु का गुरूर वो, बच्चो की थी प्रेरणा
बहनों का थी सहारा वो, भाई का घमंड
पलकें भिगोयें ये शाम की गपशप

माँ की थी जान वो, पापा की शान
आज बनी थी, बेटी से बहू वो
कितने रिश्ते थे मिले उसे
भाभी - ननद से चमका था घर

रिश्तो की लड़ी में जुड़ा नाम और
जब हुआ था सम्पन्न जीवन उसका
एक नन्ही जान ने बदला जीवन
मिला सौभाग्य माँ वो कहलायी

धीरे से ये उम्र ढली थी
माँ – पापा को भूल चली थी
पराए घर को अपनाया उसने
क्या खूब भाग्य था पाया उसने

लिया था जन्म कहीं और
अंतिम सांस कहीं और ही पायी
नमन है उस माँ, बहन, बेटी को
जिसने ये जीवन है सवांरा।

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